भरतभूमी में दही प्रायः सभी लोगों का प्रिय खाद्यपदार्थ है। भगवान श्रीकृष्ण को दही इतना प्रिय था की, वह दूध-दही बेचने निकले गोपिकाओं को रास्ते में रोककर दही की हंडिया फोडते थें, ऐसी कहानियाँ प्रसिद्ध है।
दही मंगल होने से किसी भी अच्छे काम या यात्रा को बाहर निकलने से पहले दही खाने का रिवाज है।
उत्तर भारतीय लोगों में दही-शक्कर गेहूँ की रोटी के साथ तथा दाक्षिणात्य लोगों में दही-चावल पसंदीदा खाना है। पंजाब में दही या लस्सी कितनी प्रिय है, यह अलग से कहने की जरुरत ही नहीं । महाराष्ट्र में रायता-सलाद में भी दही का प्रयोग किया जाता है, अर्थात् दही को कोई विकल्प ही नहीं है।
दही इतना महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद भी रुग्ण को पथ्य बताते समय खट्टी-मसालेदार-तली हुई चीजों के बारे में परहेज रखने के साथ दही न खाने की सलाह देने को वैद्य भूलते नहीं हैं। दही शत-प्रतिशत पथ्यकर पदार्थ है, ऐसा मेरा मानना नहीं है। परंतु, दही-सेवन के कुछ नियमों का पालन कर दही का सेवन करना आरोग्य के लिए हितकर है। क्या आप मेरे इस मत से सहमत है?




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